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आनेवाला पल, गानेवाला है उर्फ़ "यूँ होता तो क्या होता?"

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सन्न सत्तर की बात है। निर्माता ऋषिकेश मुखर्जी को एक और रोचक चलचित्र सूझा। कहानी का मुख्य पात्र था एक कर्क-रोगी, जो बस कुछ और महीनों का ही मेहमान था। कहानी तैय्यार थी, गुलज़ार की थी, ज़रूरत थी तो बस एक जीते-जागते आनंद  की। सलाह-मशवरा हुआ, और हरफ़नमौला किशोर को आनंद के किरदार के लिए चुना गया। साथ ही महमूद को चिकित्सक भास्कर के रूप में बिठाया गया। ऋषि-दा को पड़ोसन की यादगार जोड़ी से बहुत उम्मीदें थी।  वे चलचित्र का प्रस्ताव लेकर ख़ुद किशोर-दा के घर भी पहुँचे। मगर किसी ग़लत-फ़हमी की वजह से किशोर-दा के सुरक्षा-कर्मी ने ऋषि-दा को अंदर जाने से रोक दिया। उनको सख़्त आदेश मिला था—"उस बंगाली को अंदर मत आने देना!” बहरहाल, यह वो बंगाली तो नहीं थे। ऋषि-दा सकपका गए, और पल-दो-पल में वापस घर को रवाना हो गए। उमीदें, आशाएँ और अरमान, रहे तो बस तसव्वुर में। ना तो किशोर आए, ना उनके साथ महमूद। पर चलचित्र सन्न इकहत्तर में बना, और क्या ख़ूब बना। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जोड़ी लोकप्रिय रही। जोड़ी की विडम्बना देखिए, एक सितारा साँतवे आसमान पर था, तो दूसरा-सातवाँ हिंदुस्तानी-अमावस के कोहरे को ट...