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चुप: विश्लेषण

चाहत एक होती है चाहने वाले और होते हैं कहावत एक होती है कहने वाले और होते हैं बात एक होती है बताने वाले और होते हैं चाहतों, कहावतों और बातों की बुनियाद पर बनी आर बाल्की की घमासान फिल्म "चुप" ने सभी फिल्म जगत के चाहनेवालों को कुछ ना कुछ बोलने पर मजबूर कर दिया है। बात, सचनुच, जान पर जो आ गई है। फिल्म की कहानी दिलचस्प है। मायानगरी मुंबई मेरी जान में कई वरिष्ठ फिल्म आलोचकों की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। और कानून के लंबे हाथ, बगैर सबूत, मुजरिम तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे में आई जी अरविंद माथुर (सनी देओल) निकल पड़ते हैं खूनी की खोज पर। मगर ऐसे फिल्मी हालातों में, उन्हे एक हट्टे कट्टे ढाई किलो के हाथ के पहलवान, या शातिर जासूस की ज़रूरत नहीं जरूरी मालूम पड़ती। माथुर साहब एक आलोचक से ही इन गंभीर हत्याकांडों के सुराग खोजते हैं। खून खून की धारा, किसने किसको मारा? बात इंटरवल तक ही साफ हो जाती है। मगर यह फिल्म महज इतनी तुकबंदी पर नहीं चलती। खूनी कौन है, उसका मकसद क्या है, खूनी, खूनी क्यों है, इन विषयों पर चुप के प्रथम विवाद हैं। इस फिल्म में पांच और रोचक किरदार हैं: दलकर सलमान, जो फूल बेच...