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मध्यकालीन अंग्रेज़ी साहित्य और बॉलीवुड: एक ही 'ले' के दो दिलचस्प फ़िल्मी गीत

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मध्यकालीन अंग्रेज़ी साहित्य की एक बेहद मशहूर मिसाल है 'ले'। इसे आप 'लय' की तरह भी पढ़ सकते हैं। आठ-भागों में विभाजित, 'ले', (या इंगलिस्तान की दृष्टि से देखा जाए तो "ब्रेटन ले") अपनी लय से एक टाँगे-वाले की याद दिलाती है, मानो जैसे कोई ओ पी नय्यर का गीत एक पुराने बाजे पर बज रहा हो।  टिकबक-टकबक रफ़्तार वाली ये लंबी कविताएँ, अक़्सर प्रेम-कहानियों पर आधारित होती थीं/होती हैं। इस सत्र में मैंने अपने विश्वविद्यालय में एक सुप्रसिद्ध कविता "सर औऱफीओ" पढ़ी थी। इसका लेखक मैं नहीं पहचानता। बस इतना जानता हूँ, कि इसकी पहली कुछ पंक्तियों को पढ़कर मेरे मन में हमेशा की तरह फ़िल्मी गीत बजने लगे। और गीत भी कौनसा?  "एक था गुल और एक थी बुलबुल,  दोनों चमन में रहते थे, है ये कहानी बिल्कुल सच्ची, मेरे नाना कहते थे" 'सर औऱफीओ' की शुरआत भी कुछ ऐसे हुई। पहली कुछ पंक्तियों का, बस पहली ही कुछ पंक्तियों का अनुवाद मैंने कुछ ऐसे किया था: (पूरी कविता बहुत लंबी है, ज़रा वक्त लगेगा उसके अनुवाद में)। इस कविता को आप अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं। "किससे किससे, ...

इस की क्या ज़रूरत थी?

बड़े ताज्जुब की बात है कि हिंदी चलचित्र जगत (चलिए, सिनेमा या बॉलीवुड ही कह लीजिए) की समीक्षा, सराहना, और आलोचना के लिए आम आदमी अक़्सर अंग्रेज़ी सम्पादिकय विश्लेषणों की ओर ज़्यादा आकर्षित होता है। यह आकर्षण स्वाभाविक है; अंग्रेज़ी अब एक वैश्विक भाषा बन चुकी है और बॉलीवुड से जुड़ा कोई भी विश्लेषण―गर अंग्रेज़ी में छपा हो―सार्वजनिक-सा बन जाता है। और जब विश्लेषण सार्वजनिक बन जाएँ, तो यूँ समझ लीजिए, हिंदी फ़िल्म जगत की तरक्की दुगनी हो गई है। ऐसा भी नहीं कि बॉलीवुड चलचित्रों के विश्लेषण हिंदी में नही छपते होंगे। मलाल तो इस बात का होता है कि आजकल हिंदी अखबारों में हिंदी से ज़्यादा अंग्रेज़ी नज़र आती है। देवनागरी में टीकाकरण की जगह वैक्सीन पढ़ कर आँखें चौंधिया जाती हैं, यूँ लगता है जैसे ताज महल की तामीर लकड़ी से कर दी गई हो। मगर ताज तो ताज है, संग-ए-मर्मर में ही जचता है।  ठीक इसी तरह, मैं अपने "ब्लॉग" के ज़रिए हिंदी सिनेमा पर अपनी विशेष टिप्पणियाँ पेश करना चाहूँगा―क्लिष्ट से क्लिष्ट―मेरा मतलब शुद्ध हिंदी/हिंदुस्तानी में। काम ज़रा पेचीदा है, देखते हैं कितना क़ामयाब रहता है हमारा-आपका फ़िल्मीबॉय!