मध्यकालीन अंग्रेज़ी साहित्य और बॉलीवुड: एक ही 'ले' के दो दिलचस्प फ़िल्मी गीत

मध्यकालीन अंग्रेज़ी साहित्य की एक बेहद मशहूर मिसाल है 'ले'। इसे आप 'लय' की तरह भी पढ़ सकते हैं। आठ-भागों में विभाजित, 'ले', (या इंगलिस्तान की दृष्टि से देखा जाए तो "ब्रेटन ले") अपनी लय से एक टाँगे-वाले की याद दिलाती है, मानो जैसे कोई ओ पी नय्यर का गीत एक पुराने बाजे पर बज रहा हो। 

टिकबक-टकबक रफ़्तार वाली ये लंबी कविताएँ, अक़्सर प्रेम-कहानियों पर आधारित होती थीं/होती हैं। इस सत्र में मैंने अपने विश्वविद्यालय में एक सुप्रसिद्ध कविता "सर औऱफीओ" पढ़ी थी। इसका लेखक मैं नहीं पहचानता। बस इतना जानता हूँ, कि इसकी पहली कुछ पंक्तियों को पढ़कर मेरे मन में हमेशा की तरह फ़िल्मी गीत बजने लगे। और गीत भी कौनसा? 

"एक था गुल और एक थी बुलबुल, 
दोनों चमन में रहते थे,
है ये कहानी बिल्कुल सच्ची,
मेरे नाना कहते थे"




'सर औऱफीओ' की शुरआत भी कुछ ऐसे हुई। पहली कुछ पंक्तियों का, बस पहली ही कुछ पंक्तियों का अनुवाद मैंने कुछ ऐसे किया था: (पूरी कविता बहुत लंबी है, ज़रा वक्त लगेगा उसके अनुवाद में)। इस कविता को आप अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं।

"किससे किससे, सुने हैं किस्से,
कितने कितने किस्म के किस्से।
राजाओं के रजवाड़ों के,
उनके ज़्याती खिलवाड़ों के।
सन्तरी के, मंत्री के,
कई लड़े-मरे खत्री के।
वफ़ा के, बेवफ़ाई के,
हमदर्द के, हरजाई के।
परदेसियों से सुने हैं किस्से,
हाँ, परदेसियों के सुने हैं किस्से।
एक और अजब सा किस्सा है,
सबकी हसरत का हिस्सा है।
मोहब्बत! मोहब्बत! मोहब्बत!"

कविता की शुरुआत एक बातचीत से होती है, गीत संगीत पर ज़ोर होता है, जैसे कोई बंजारा इकतारे के साज़ पर एक रोमांचक कहानी सुनाने जा रहा है। 

उसी लिहाज़ से शशि कपूर को इस बंजारे के पहलू में बिठा दीजिए। कैसे वे नंदा को एक गुल-और-बुलबुल की चर्चित कहानी सुना रहे होते हैं। 

बात यहीं ख़त्म नही होती, एक "ले" की कहानी में भी एक मसालेदार हिंदी चलचित्र की तरह उतार चढ़ाव होते हैं। प्रेमी-प्रेमिका का मिलना, मिलकर प्यार क़ुबूल करना, दुर्भाग्यवश बिछड़ जाना और अंत में फ़िरसे मिल जाना। 

"रौकी" फ़िल्म का वो गाना याद आ गया:

"हम तुमसे मिले,
फ़िर जुदा हो गए,
देखो फ़िर मिल गए,
अब होके जुदा,
फ़िर मिलें ना मिलें,
क्यों ना ऐसा करें?
मिल जायें चलो,
हम सदा के लिए"




मध्यकालीन अंग्रेज़ी कविताएँ पढ़ते-पढ़ते मेरा फ़िल्मी भूत इन्ही सब बातों में कई बार उलझ या सुलझ जाता है। हिंदी सिनेमा और अंग्रेज़ी साहित्य को लोग शायद विशाल भारद्वाज की फिल्मों से ही जोडें पर मेरे हिसाब से, साहित्य महज़ कहानियों की महफ़िल है, जहाँ जिसने पहले मुकर्रर कहा, कहानी उसकी हो गई।

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