इस की क्या ज़रूरत थी?
बड़े ताज्जुब की बात है कि हिंदी चलचित्र जगत (चलिए, सिनेमा या बॉलीवुड ही कह लीजिए) की समीक्षा, सराहना, और आलोचना के लिए आम आदमी अक़्सर अंग्रेज़ी सम्पादिकय विश्लेषणों की ओर ज़्यादा आकर्षित होता है। यह आकर्षण स्वाभाविक है; अंग्रेज़ी अब एक वैश्विक भाषा बन चुकी है और बॉलीवुड से जुड़ा कोई भी विश्लेषण―गर अंग्रेज़ी में छपा हो―सार्वजनिक-सा बन जाता है। और जब विश्लेषण सार्वजनिक बन जाएँ, तो यूँ समझ लीजिए, हिंदी फ़िल्म जगत की तरक्की दुगनी हो गई है।
ऐसा भी नहीं कि बॉलीवुड चलचित्रों के विश्लेषण हिंदी में नही छपते होंगे। मलाल तो इस बात का होता है कि आजकल हिंदी अखबारों में हिंदी से ज़्यादा अंग्रेज़ी नज़र आती है। देवनागरी में टीकाकरण की जगह वैक्सीन पढ़ कर आँखें चौंधिया जाती हैं, यूँ लगता है जैसे ताज महल की तामीर लकड़ी से कर दी गई हो। मगर ताज तो ताज है, संग-ए-मर्मर में ही जचता है।
ठीक इसी तरह, मैं अपने "ब्लॉग" के ज़रिए हिंदी सिनेमा पर अपनी विशेष टिप्पणियाँ पेश करना चाहूँगा―क्लिष्ट से क्लिष्ट―मेरा मतलब शुद्ध हिंदी/हिंदुस्तानी में। काम ज़रा पेचीदा है, देखते हैं कितना क़ामयाब रहता है हमारा-आपका फ़िल्मीबॉय!
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