हिप हिप हुर्रे!

चलिए बताइए हिंदी सिनमा का पहला खेल-प्रधान चलचित्र कौनसा था? जो जीता वही सिकंदर? नहीं संजू! हाँ, लोकप्रियता के अनुसार मंसूर खान की साइकल ही सबसे तेज चली थी। मगर सबसे पहला खेल-प्रधान चलचित्र, ना साइकल, ना हॉकी और ना ही क्रिकेट पर आधारित था। बॉलीवुड में सबसे पहली "स्पोर्ट्स-फ़िल्म" थी 1984 में आइ गुलज़ार द्वारा लिखी गई हिप हिप हुर्रे! निर्देशक थे प्रकाश "पोलिटिकल" झा, जो आज 70 के हो गए हैं। जन्मदिन की शुभकामनाओं के संग आइए फ़ुट्बॉल का खेल आरम्भ करते हैं।

हिप हिप हुर्रे के अभिनेताओं की प्रधान सूची में थे राज किरण, दीप्ति नवल, शफ़ी इनामदार और राम गोपाल बजाज। सभी अस्सी के दशक के "पैरलेल सिनमा" के जाने माने चेहरे थे। ये और बात है कि इस चलचित्र के लिए पहले अनिल कपूर और शबाना आज़मी को चुना गया था। हम ठहरे सलीम-जावेद के तौर-तरीक़ों के दीवाने: हमारे लिए हिप हिप हुर्रे के असली सितारे थे लेखक गुलज़ार। गीत भी लिखे, डाइयलोग भी और पटकथा भी, तीनों बेहद निपुणता से। कहानी क्या थी?

"एक सुबह एक मोड़ पर
मैंने कहा उसे रोक कर
हाथ बढ़ा ऐ ज़िंदगी 
आँख मिलाके बात कर"

कम्प्यूटर एंजिनीर संदीप (किरण) आइ डी एम (आपको भी पता है किस संस्था की नकल है) में एक नौकरी के तलबगार होते हैं। उनके विश्वासनिय साक्षात्कार के परिणाम देने के लिए संस्था उन्हें दो हफ़्तों का वक़्त देती है। इन दो हफ़्तों को संदीप निष्कर्म जीवन या मनन में नहीं व्यतित करना चाहते। वे इस दौरान नौकरी और जुनून का ऐसा मेल मिलाते हैं, जो उन्हें ज़िंदगी भर याद रहेगा। खेल-कूद के प्रशिक्षक बन जाते हैं, राँची के जमनादास विद्यालय में; अपने विद्यालय में। 

बम्बई से राँची तक के सफ़र में संदीप को शहरी और देहाती ज़िंदगी के रंग दिखाई पड़ते हैं। ना ऊँची इमारतें होती हैं, ना ऊँचे ख़याल। "खेल-कूद में क्या रखा है? इनहि की वजह से हमारा देश पिछड़ा हुआ है!" और "आप तो कम्प्यूटर में ग्रैजूएट हैं! यहाँ किसलिए आए" जैसे संकेत देख, संदीप थोड़े से निराश हो जाते हैं। मगर चलचित्र कभी निराश नहीं होता। जहाँ संदीप को एक जगह निंदक मिलते हैं, वहीं दोस्त भी मिल जाते हैं। अटल रहकर वे विद्यालय का एक नया फ़ुट्बॉल ख़ेमा बनाते हैं, और खिलाड़ियों से दोस्ती कर लेते हैं। मोहब्बत भी हो जाती है, अनुराधा मैडम (दीप्ति नवल) से। क्या होता है जब वे मैदान में उतरते हैं? क्या होता है जब वे निजी ज़िंदगी पर मनन कर रहे होते हैं? हिप हिप हुर्रे ज़िंदगी के इन्हें दोहरे खेलों की एक सुहावनी कड़ी है। 

एक तरह से देखा जाए तो हिप हिप हुर्रे एक देसी "डेड पोयट्स सॉसाययटी" है, हालाँकि रॉबिन विल्यम्ज़ का वह चलचित्र, इस चलचित्र से कुछ 6 साल बाद आया था। उस चलचित्र की बात चली है तो एक बात और याद आती है: राज किरण! "ओ कैप्टन, माई कैप्टन! कहाँ हैं आप? लौट आइए!"

हिप हिप हुर्रे बेहद नर्म-गर्म दिल की है। मगर इसके दिल में छुपे हैं हिंदी सिनमा के कुछ ऐसे प्रचलित ठप्पे, जो जनता को आज बासी लगें। जैसे राज किरण के नर्म-दिल मिज़ाजी प्रशिक्षक में हमें परिचय के जीतेन्द्र की झलक नज़र आती है। हमें राम गोपाल बजाज के प्रधान-अध्यापक में वही पुराना हताशावाद दिखता है। और हमें हिंदी शिक्षकों का अपमान भी वही घिसे-पिटे पुराने तरीक़ों से परोसा जाता है। हिंदी सिनमा, जो इसी भाषा की रोटी खाता है, इस भाषा के शिक्षकों को यूँ जोकरों जैसा क्यों दर्शाता है? वही देसी रंग-रूप, वही बात बात पर रोकना टोकना, वही शुद्ध हिंदी में हर वक़्त वार्तालाप करना (हाँ, मैं भी अभी वही कर रहा हूँ, बस चलिशे नहीं बना), और वही हिंदी पढ़ते समय अश्लील मज़ाक़ करना। एक हद तक सभ मजजकिया लगता है, बार बार देखने के बाद ज़रा खटकता है। ये तो रही बात अध्यापकों की, नज़र डालते हैं विद्यार्थियों पर। सभी लड़के एक क़तार में खड़े हो जाएँ!

बेबाक़, बेसुध जवानी मैदानों में लोट रही होती है। कुछ आदर्शवादी लड़के होते हैं, कुछ दादागिरी करने वाले। झुकने वाले झुकते हैं, झुकाने वाले सलाम लेते हैं। ये वो बच्चे होते हैं जिन्हें हम-आप स्कूली दिनों में बदमाश कहते होंगे। ये लड़के कक्षा-परीक्षा-शिक्षा छोड़ कैंटीन में मस्त-मौला चिगरेट पीते हैं, पत्ते-बाज़ी करते हैं, और चार पैसे की आशिक़ी करते हैं। हिप हिप हुर्रे की इस "गैंग" का प्रधान होता है रघु (निखिल भगत)। उलझे हुए बाल, ढीली क़मीज़ और लम्बा, पटल शरीर, रघु पेश करत है खिलाड़ियों वाल देह, और मन में ख़ूब सारा संदेह। किस बात का? एक तरफ़ प्यार का: जो उसे अनुराधा मैडम से होता है। ख़ैर, अंधेर नहीं, देर सही, रघु सीधा हो जाता है: संदीप के अटल स्नेह से। अध्यापिका से उंस हो जाना, और दादा-से-"डिसप्लिन" तक का यह सफ़र बॉलीवुड जाने कितनी बार तय कर चुका है। 

मगर यह सब शायद हिप हिप हुर्रे से पहले कम हुआ करत होगा। और यह सब "चलिशे" हिप हिप हुर्रे को और दिलचस्प बनाते हैं, कहानी को आगे बढ़ाते हैं। तो इस चलचित्र की सबसे बड़ी खूबी हुई इन सभी प्रचलित रूढ़ियों को उचित रूप से एकांकित कर के पेश करना; जो गुलज़ार साहब बखूबी जानते हैं। चलचित्र के समवाद भी सरस हैं: "खेल हार-जीत से नहीं होता, खेल होता है खेलने से"। 

पर खेल किसी जंग से कम तो नहीं होता। और जंग कभी शांति में नहीं होती। लाज़मी है, इस "जंग" में गाजे-बाजे से सुसज्जित संगीत होगा। नहीं, इस चलचित्र में कोई "चक दे इंडिया" या "हल्ला बोल" नहीं। पैरलेल सिनमा के मशहूर संगीतकार वनराज भाटिया संगीत का बेहद सूझ-बूझ के साथ प्रयोग करते हैं। दो चार अहम दृश्यों में सहसा सिंथेसाइज़र की ध्वनियाँ चित्र-पटल को एक संगीन रस में ढाल देती हैं। बाकी समय फुटबॉल का खेल होता है, और शोरगुल के बीच एक साफ़ नारा: "वी वांट गोल! कम ऑन रघु! वी वांट गोल!"

इस नारे पर गौर करें। हिप हिप हुर्रे हिंदी सिनमा के उन चुनिंदा चलचित्रों में से है जिसमें आप खेल और राष्ट्रवाद को समदृष्टि से नहीं देखते। हम "इंडिया! इंडिया!" नहीं "रघु! रघु!" के नारे लगाते हैं। हालाँकि दोनों नारे अपनी जगह सरस और प्रभावशाली हैं। बस यह जान कर ताज़ा लगता है कि बड़े पर्दे पर ऐसी भी कहानियाँ जहाँ हम मुल्क के ही नहीं, मोहल्ले के भी भूटिया या छेतरी का समर्थन कर सकते हैं। ताज़ा लगता है जब खेल-प्रधान चलचित्रों में मुल्कों की बंदिशें नहीं रहती। मैं खेल-राष्ट्रवादी सिनमा का निंदक नहीं हूँ, बस दूसरी लगान, दूसरी चक दे इंडिया का इंतेज़ार कर रहा हूँ: अरसा हो गया है।

बात राष्ट्रवाद की हो, और राजनीति की नहीं? ऐसा आज के समाज में कदापि सम्भव नहीं। चलिए नज़र डालते हैं प्रकाश "पोलिटिकल" झा की निर्देशन कड़ी पर। 

साहब गंगाजल और अपहरण से लेकर स्वयं राजनेती और सत्याग्रह जैसे चलचित्र बना चुके हैं। इस शैली में इन्हीं का वर्चस्व रहता है। मगर दिल क्या करे, इन्होंने और भी कई दिलचस्प चलचित्र बनाएँ हैं, जो हमारी जुम्मा-जुम्मा बदलती नज़र और सदियों सदियों रहते अड़ियल विचारों के पर्दों से ओझल हो गए हों। मशहूर चलचित्र विश्लेषणकारी अविजित घोष की किताब "40 रीटेक्स" भी कुछ ऐसा ही कहती है।

जन्मदिन मुबारक हो झा साहब! सत्तर के हो गए हैं! एक चलचित्र हॉकी पर भी हो जाए?









 














































 





 

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