Posts

Showing posts from February, 2022

हिप हिप हुर्रे!

Image
चलिए बताइए हिंदी सिनमा का पहला खेल-प्रधान चलचित्र कौनसा था? जो जीता वही सिकंदर? नहीं संजू! हाँ, लोकप्रियता के अनुसार मंसूर खान की साइकल ही सबसे तेज चली थी। मगर सबसे पहला खेल-प्रधान चलचित्र, ना साइकल, ना हॉकी और ना ही क्रिकेट पर आधारित था। बॉलीवुड में सबसे पहली "स्पोर्ट्स-फ़िल्म" थी 1984 में आइ गुलज़ार द्वारा लिखी गई हिप हिप हुर्रे! निर्देशक थे प्रकाश "पोलिटिकल" झा, जो आज 70 के हो गए हैं। जन्मदिन की शुभकामनाओं के संग आइए फ़ुट्बॉल का खेल आरम्भ करते हैं। हिप हिप हुर्रे के अभिनेताओं की प्रधान सूची में थे राज किरण, दीप्ति नवल, शफ़ी इनामदार और राम गोपाल बजाज। सभी अस्सी के दशक के "पैरलेल सिनमा" के जाने माने चेहरे थे। ये और बात है कि इस चलचित्र के लिए पहले अनिल कपूर और शबाना आज़मी को चुना गया था। हम ठहरे सलीम-जावेद के तौर-तरीक़ों के दीवाने: हमारे लिए हिप हिप हुर्रे के असली सितारे थे लेखक गुलज़ार। गीत भी लिखे, डाइयलोग भी और पटकथा भी, तीनों बेहद निपुणता से। कहानी क्या थी? "एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा उसे रोक कर हाथ बढ़ा ऐ ज़िंदगी  आँख मिलाके बात कर" कम्प्...

इजाज़त है?

माया तुम्हे गए हुए अरसा हो चुका है। पर ज़िन्दगी वहीं ठहरी हुई सी लगती है। मैं वहीं, मेरा तसव्वुर वहीं ठहरा हुआ लगता है। लब पर कोई बात, ज़बान पर किसी बीते हुए लम्हे की लज़्ज़त गर लग जाए, तुम्हारे साथ बिताए हुए लम्हों का ज़ायक़ा याद आ जाता है। किसी गिलौरी की तरह, मीठा और तेज़-तर्रार तस्सवुर है तुम्हारा। इतना नशीला कि ना तो उसे कोई शराब ना शबाब हरा सकता है। वो शराब को और क्या कहते हैं? हाँ सुधा! बेचारी सुधा। या खुदगर्ज़ में? शायद सुधा ही मेरा मक़सद समझ न सकी। मेरी मन्ज़िल बेवफ़ाई नहीं रिहाई थी। कल की यादों को छोड़, कल की यादों तक का सफ़र तय किया था मैंने। बस एक बार, एक बार तुमसे मुलाक़ात हो जाती। एक इजाज़त माँगी थी तुमसे, उससे, और ख़ुद से, "भूल जाओ, आगे बढ़ो"। कोई नाहीं भूला। हाँ, वक्त ज़रूर भूल गया सब कुछ, आगे बढ़ गया और छोड़ गया यादों की पोटली के सामान। वो समान, हमारी यादों का सामान, अब तुम्हारे पास रख छोड़ा है वक्त ने। वो तुमहारे अलग रंग ढंग, तुम्हारी खामोश आँखें, जो अपने अंदर शायद एक अनदेखा तूफ़ान समेटे थीं, तुम्हारा वो हंसता हुआ, पगला सा चेहरा। सब कुछ, सब का सब, यहाँ है, मेरे ज़हन में। मैं आज तक ...

ख़याल: गहराइयाँ

बेवफ़ाई और बॉलीवुड का रिश्ता बहुत पुराना है। सनम बेवफा से लेकर बेवफा सनम तक, दर्शकों ने सब देख रखा है। पर बॉलीवुड ने ठान लिया है कभी अलविदा ना कहना―अपनी वही पुरानी घिसी-पिटी कथन शैली को। लाज़मी है, बेवफाई दर्शाने वाले चलचित्रों को आम आदमी एक नज़रिए और मत से देखता है। व्यावाहिक जीवन में अनबन होती है, शारीरिक या मानसिक असंतोष होता है, और ऐसे में मिल जाता है पति या पत्नी को "वो"। और "वो" के आने के बाद आती है तबाही, और ढेर सारा कलेश। अंत तक फ़िर वही होता है जो मंज़ूर-ए-खुदा होता है। आज तक तो दर्शक यही देखते आ रहे हैं, गहराइयाँ में भी क्या वही देखेंगे? हाँ और ना। प्यास होती तो सलिल में डूब जाती, वासना मिटती न तो मुझको मिटाती, पर नहीं अनुराग है मरता किसी का; प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का। -हरिवंश राय बच्चन (मिलन यामिनी) गहराइयाँ कहानी है चार शहरी पात्रों की: अलीशा (दीपिका पादुकोण), करन (धैर्य करवा), टीआ (अनन्या पांडे) और ज़ैन (सिद्धांत चतुर्वेदी)। और बेवफ़ाई की बीड़ा उठाते हैं अलीशा और ज़ैन, जो अपने पिछले रिश्तों में असंतुष्ट हैं, या एक दूसरे से पहली मुलाक़ात में ही मोह गए ...