इजाज़त है?

माया
तुम्हे गए हुए अरसा हो चुका है। पर ज़िन्दगी वहीं ठहरी हुई सी लगती है। मैं वहीं, मेरा तसव्वुर वहीं ठहरा हुआ लगता है। लब पर कोई बात, ज़बान पर किसी बीते हुए लम्हे की लज़्ज़त गर लग जाए, तुम्हारे साथ बिताए हुए लम्हों का ज़ायक़ा याद आ जाता है। किसी गिलौरी की तरह, मीठा और तेज़-तर्रार तस्सवुर है तुम्हारा। इतना नशीला कि ना तो उसे कोई शराब ना शबाब हरा सकता है। वो शराब को और क्या कहते हैं? हाँ सुधा! बेचारी सुधा। या खुदगर्ज़ में?

शायद सुधा ही मेरा मक़सद समझ न सकी। मेरी मन्ज़िल बेवफ़ाई नहीं रिहाई थी। कल की यादों को छोड़, कल की यादों तक का सफ़र तय किया था मैंने। बस एक बार, एक बार तुमसे मुलाक़ात हो जाती। एक इजाज़त माँगी थी तुमसे, उससे, और ख़ुद से, "भूल जाओ, आगे बढ़ो"। कोई नाहीं भूला। हाँ, वक्त ज़रूर भूल गया सब कुछ, आगे बढ़ गया और छोड़ गया यादों की पोटली के सामान। वो समान, हमारी यादों का सामान, अब तुम्हारे पास रख छोड़ा है वक्त ने। वो तुमहारे अलग रंग ढंग, तुम्हारी खामोश आँखें, जो अपने अंदर शायद एक अनदेखा तूफ़ान समेटे थीं, तुम्हारा वो हंसता हुआ, पगला सा चेहरा। सब कुछ, सब का सब, यहाँ है, मेरे ज़हन में। मैं आज तक नहीं भूला। मैं।

मैं इसी मय का तो मारा था, माया। याद है वो एक शाम जब हम एक दूसरे से रूठ गए? वो शाम जब हम आखरी बार मिले? सुधा ने एक दफा बहुत सही अशआर कहे थे: गिरते गिरते ख्वाबों में बची मैं, सपने पे पाओं पड़ गया था। शायद वही हुआ मेरे साथ, तुम्हारे साथ। हमारी मुलाक़ात शायद एक ख़्वाब ही थी बस। और ज़िन्दगी होती क्या है भला? किसी दीवाने ख़ुदा का ख्वाब!

कई बार मनाया सुधा ने मुझे। कई बार हम आपस मे नए सम्बन्ध बानाने की हद तक पहुंचे। हर मुक़ाम पर लेकिन, तुम याद आई। ऐसा लगा, मेरी मंज़िल सुधा की बैसाखियाँ नहीं, तुम्हारा दीवाना दिल है। गलत था या सही था पता नहीं, पर उस समय जो सही लगा, वही कर रहा था, जैसा सुधा कभी चाहती थी। ग़लत ही था शायद, अब ना तो मेरे दरमियाँ सुधा है, ना तुम हो। इस "मैं"कश के पास सिर्फ मैं ही बचा है। अब पूरा होने की गुंजाइश या गुज़ारिश नही। आधा हूँ, अधूरा नहीं, दिल के दो कोनों में तुम दोनों की याद है बस।

मैं बुरा आदमी नहीं हूँ, माया। हल्का सा मनचला, थोड़ा सा दिलफेंक, और ज़रा सा भोला-दीवाना। सबकी ख़ैरियत चाहता था, सबकी ख़ैरियत पूछता रहता हूँ, इस मक़सद से, कि कोई मुझे तुम्हारा पता बता देगा। रही बात सुधा की। अब उसने मुझसे आखरी इजाज़त ले ली है। उसको कोई और मिल गया है। मैं खूश हूँ, मेरे जैसा अझेल और ढीला लड़का नहीं है वो। सुंदर भी है। चाँद जैसा।

पर तुम कहाँ हो? ना चिट्ठी, ना संदेश देती हो, ना खत पढ़ती हो, ना जवाब देती हो। बड़ा बुज़दिल क़ासिद है तुम्हारा, या वो मुझसे ही आँखे चुरा रहा है, वैसे ही, जैसे मैं आईने से आंखें चुरा लेता हूँ।

आज फ़िर बरसात हुई। किसी अजनबी बूंद की तरह तुम्हारा तस्सवुर मेरे ज़ेहन की खिड़की से टकरा गया। ना जाने क्यो, दिल भर गया, ना जाने क्यों, आँख भर गई।

तुम्हारा
महेंद्र





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