ख़याल: गहराइयाँ
बेवफ़ाई और बॉलीवुड का रिश्ता बहुत पुराना है। सनम बेवफा से लेकर बेवफा सनम तक, दर्शकों ने सब देख रखा है। पर बॉलीवुड ने ठान लिया है कभी अलविदा ना कहना―अपनी वही पुरानी घिसी-पिटी कथन शैली को। लाज़मी है, बेवफाई दर्शाने वाले चलचित्रों को आम आदमी एक नज़रिए और मत से देखता है। व्यावाहिक जीवन में अनबन होती है, शारीरिक या मानसिक असंतोष होता है, और ऐसे में मिल जाता है पति या पत्नी को "वो"। और "वो" के आने के बाद आती है तबाही, और ढेर सारा कलेश। अंत तक फ़िर वही होता है जो मंज़ूर-ए-खुदा होता है। आज तक तो दर्शक यही देखते आ रहे हैं, गहराइयाँ में भी क्या वही देखेंगे?
हाँ और ना।
प्यास होती तो सलिल में डूब जाती,
वासना मिटती न तो मुझको मिटाती,
पर नहीं अनुराग है मरता किसी का;
प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का।
-हरिवंश राय बच्चन (मिलन यामिनी)
गहराइयाँ कहानी है चार शहरी पात्रों की: अलीशा (दीपिका पादुकोण), करन (धैर्य करवा), टीआ (अनन्या पांडे) और ज़ैन (सिद्धांत चतुर्वेदी)। और बेवफ़ाई की बीड़ा उठाते हैं अलीशा और ज़ैन, जो अपने पिछले रिश्तों में असंतुष्ट हैं, या एक दूसरे से पहली मुलाक़ात में ही मोह गए हैं। पहली मुलाकात कहाँ? एक कश्ती पर। प्यार की कश्ती में, लहरों की मस्ती में आगे क्या होता है?
अफ़सोस।
बेवफाई में अफसोस होना लाज़मी है, और यह अफ़सोस कभी कभी दिल-ओ-दिमाग पर यूं हावी हो जाता है, मानो जान तक आ गया हो। पहली नज़र में यूँ लग सकता है कि यह चलचित्र बेवफ़ाई को सराह रहा है, जबकि चलचित्र अपने दो घंटे एक "थ्रिलर" की तरह बिताता है, जहाँ आप यह ना समझ पाएंगे कि अगला आदमी क्या सोच रहा है। रिश्ते नातों को व्यापार (और सचमुच व्यापार) से जोड़ेंगे तो निष्कर्ष तो यही होगा, ना।
दो घंटे? ज़्यादा तो नहीं? हाँ हैं, कहानी और जल्दी निपट सकती थी। चूंकि यह चलचित्र ऐसा है कि इसमें वक्त का होश हरदम रहता है। दर्शकों को भी और पात्रों को भी।
अतीत के दाग और भविष्य की बेचैनियों से लैस है गहराइयाँ। जहाँ एक जगह अलीशा अपने कड़वे गुज़रे कल को नए रिश्तों से भुलाना चाहती हैं, वहाँ उनके आशिक ज़ैन की "कल-किसने-देखा" प्रतिक्रिया उनके रिश्ते में एक दिलचस्प विलोम डाल देती है।
ज़ैन और अलीशा को छोड़, करन और टीआ की ज़िंदगी ज़्यादातर सुलझी हुई लगती है। वे दोनों हसमुख होते हैं, प्यार से ऊपर दोस्ती को रखते हैं, और लोगों पर विश्वास करते हैं। दुख होता है जब ऐसे लोगों को उनके साथी तन्हा छोड़ देते हैं। मगर गहराइयाँ खेल है इन्ही ज़ाती फ़ैसलों का। कब कौनसा फ़ैसला जीवन नैय्या को किस जानिब ले जाए, कोई नही जानता।
आते हैं सहायक क़िरदारों पर। जितेश (रजत कपूर) ज़ैन के लिए पिता समान होते हैं, और अपना चालाक किरदार बखूबी निभाते हैं। दूसरे सहायक किरदार कौन हैं भला? आपसे इस मासूम सवाल को पूछने की इजाज़त चाहता हूँ। नही पता? फ़िक्र मत करिये, मैं हूँ ना! व किरदार है अलीशा के उलझे-सुलझे पिता का है जो निभाया है―
नसीरुद्दीन शाह ने?
बिल्कुल सही! भई ऐसे बाप को बड़े पर्दे पर झलकाने से कभी शाह साहब कतराए हैं? और किरदार पुराना ही सही, उनसे बेहतर कोई इसे अदा कर पाया है? ना। मेरी राय में, इस चलचित्र में सबसे अव्वल अभिनय उन्ही का है (फिर दीपिका का, फिर सिद्धांत का, फिर बाकी सब का)।
क्या अलीशा के पिता अपने फैसलों में सही थे? क्या अलीशा अपने फैसलों में सही थीं? गैर से देखा जाए तो गहराइयाँ रिश्तों की गिरहों, गहराइयों को आज के दौर में ही नही, पीढ़ी दर पीढ़ी देखती है। रिश्तों को दर्शाने में शकुन बत्रा बचपन से माहिर हैं। मात खा गए बस चलचित्र की लंबाई में।
कुछ और चीज़ें रह गईं।
चलचित्र में काफी सारे वासनामय दृश्य देखने की संभावना है। इस बात पर काफ़ी शोरगुल भी हो चुका है। अब का करूँ सजनी! चलचित्र तो "एडल्ट" पद्धति से नवाज़ा गया है। बाकी आप सब बड़े लोग समझदार हैं। बच्चे हैं, तो दूर रहिए या फिर माँ-पापा संग चादर बीच दुपक कर गांधारी की तरह आधा चलचित्र देख लीजिये। वो कहते हैं ना, आपका भी "टाइम" आएगा।
चलचित्र में एक बड़ी ही लोकप्रिय अंग्रेजी गाली का भी प्रयोग किया गया है। थोड़ा अभद्र लगा, पर यही हैं आजकल की पीढ़ी के वास्तविक रंग-रूप।
अंततः इस चलचित्र में उतनी ही अंग्रेज़ी बोली गई है, जितनी इस विश्लेषण में हिन्दी। क्या ये हिंदी चलचित्र है? जाइये, इस सवाल का जवाब आपको एक डुबकी लगाने के बाद ही पता लगेगा।
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