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चुप: विश्लेषण

चाहत एक होती है चाहने वाले और होते हैं कहावत एक होती है कहने वाले और होते हैं बात एक होती है बताने वाले और होते हैं चाहतों, कहावतों और बातों की बुनियाद पर बनी आर बाल्की की घमासान फिल्म "चुप" ने सभी फिल्म जगत के चाहनेवालों को कुछ ना कुछ बोलने पर मजबूर कर दिया है। बात, सचनुच, जान पर जो आ गई है। फिल्म की कहानी दिलचस्प है। मायानगरी मुंबई मेरी जान में कई वरिष्ठ फिल्म आलोचकों की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। और कानून के लंबे हाथ, बगैर सबूत, मुजरिम तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे में आई जी अरविंद माथुर (सनी देओल) निकल पड़ते हैं खूनी की खोज पर। मगर ऐसे फिल्मी हालातों में, उन्हे एक हट्टे कट्टे ढाई किलो के हाथ के पहलवान, या शातिर जासूस की ज़रूरत नहीं जरूरी मालूम पड़ती। माथुर साहब एक आलोचक से ही इन गंभीर हत्याकांडों के सुराग खोजते हैं। खून खून की धारा, किसने किसको मारा? बात इंटरवल तक ही साफ हो जाती है। मगर यह फिल्म महज इतनी तुकबंदी पर नहीं चलती। खूनी कौन है, उसका मकसद क्या है, खूनी, खूनी क्यों है, इन विषयों पर चुप के प्रथम विवाद हैं। इस फिल्म में पांच और रोचक किरदार हैं: दलकर सलमान, जो फूल बेच...

हिप हिप हुर्रे!

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चलिए बताइए हिंदी सिनमा का पहला खेल-प्रधान चलचित्र कौनसा था? जो जीता वही सिकंदर? नहीं संजू! हाँ, लोकप्रियता के अनुसार मंसूर खान की साइकल ही सबसे तेज चली थी। मगर सबसे पहला खेल-प्रधान चलचित्र, ना साइकल, ना हॉकी और ना ही क्रिकेट पर आधारित था। बॉलीवुड में सबसे पहली "स्पोर्ट्स-फ़िल्म" थी 1984 में आइ गुलज़ार द्वारा लिखी गई हिप हिप हुर्रे! निर्देशक थे प्रकाश "पोलिटिकल" झा, जो आज 70 के हो गए हैं। जन्मदिन की शुभकामनाओं के संग आइए फ़ुट्बॉल का खेल आरम्भ करते हैं। हिप हिप हुर्रे के अभिनेताओं की प्रधान सूची में थे राज किरण, दीप्ति नवल, शफ़ी इनामदार और राम गोपाल बजाज। सभी अस्सी के दशक के "पैरलेल सिनमा" के जाने माने चेहरे थे। ये और बात है कि इस चलचित्र के लिए पहले अनिल कपूर और शबाना आज़मी को चुना गया था। हम ठहरे सलीम-जावेद के तौर-तरीक़ों के दीवाने: हमारे लिए हिप हिप हुर्रे के असली सितारे थे लेखक गुलज़ार। गीत भी लिखे, डाइयलोग भी और पटकथा भी, तीनों बेहद निपुणता से। कहानी क्या थी? "एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा उसे रोक कर हाथ बढ़ा ऐ ज़िंदगी  आँख मिलाके बात कर" कम्प्...

इजाज़त है?

माया तुम्हे गए हुए अरसा हो चुका है। पर ज़िन्दगी वहीं ठहरी हुई सी लगती है। मैं वहीं, मेरा तसव्वुर वहीं ठहरा हुआ लगता है। लब पर कोई बात, ज़बान पर किसी बीते हुए लम्हे की लज़्ज़त गर लग जाए, तुम्हारे साथ बिताए हुए लम्हों का ज़ायक़ा याद आ जाता है। किसी गिलौरी की तरह, मीठा और तेज़-तर्रार तस्सवुर है तुम्हारा। इतना नशीला कि ना तो उसे कोई शराब ना शबाब हरा सकता है। वो शराब को और क्या कहते हैं? हाँ सुधा! बेचारी सुधा। या खुदगर्ज़ में? शायद सुधा ही मेरा मक़सद समझ न सकी। मेरी मन्ज़िल बेवफ़ाई नहीं रिहाई थी। कल की यादों को छोड़, कल की यादों तक का सफ़र तय किया था मैंने। बस एक बार, एक बार तुमसे मुलाक़ात हो जाती। एक इजाज़त माँगी थी तुमसे, उससे, और ख़ुद से, "भूल जाओ, आगे बढ़ो"। कोई नाहीं भूला। हाँ, वक्त ज़रूर भूल गया सब कुछ, आगे बढ़ गया और छोड़ गया यादों की पोटली के सामान। वो समान, हमारी यादों का सामान, अब तुम्हारे पास रख छोड़ा है वक्त ने। वो तुमहारे अलग रंग ढंग, तुम्हारी खामोश आँखें, जो अपने अंदर शायद एक अनदेखा तूफ़ान समेटे थीं, तुम्हारा वो हंसता हुआ, पगला सा चेहरा। सब कुछ, सब का सब, यहाँ है, मेरे ज़हन में। मैं आज तक ...

ख़याल: गहराइयाँ

बेवफ़ाई और बॉलीवुड का रिश्ता बहुत पुराना है। सनम बेवफा से लेकर बेवफा सनम तक, दर्शकों ने सब देख रखा है। पर बॉलीवुड ने ठान लिया है कभी अलविदा ना कहना―अपनी वही पुरानी घिसी-पिटी कथन शैली को। लाज़मी है, बेवफाई दर्शाने वाले चलचित्रों को आम आदमी एक नज़रिए और मत से देखता है। व्यावाहिक जीवन में अनबन होती है, शारीरिक या मानसिक असंतोष होता है, और ऐसे में मिल जाता है पति या पत्नी को "वो"। और "वो" के आने के बाद आती है तबाही, और ढेर सारा कलेश। अंत तक फ़िर वही होता है जो मंज़ूर-ए-खुदा होता है। आज तक तो दर्शक यही देखते आ रहे हैं, गहराइयाँ में भी क्या वही देखेंगे? हाँ और ना। प्यास होती तो सलिल में डूब जाती, वासना मिटती न तो मुझको मिटाती, पर नहीं अनुराग है मरता किसी का; प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का। -हरिवंश राय बच्चन (मिलन यामिनी) गहराइयाँ कहानी है चार शहरी पात्रों की: अलीशा (दीपिका पादुकोण), करन (धैर्य करवा), टीआ (अनन्या पांडे) और ज़ैन (सिद्धांत चतुर्वेदी)। और बेवफ़ाई की बीड़ा उठाते हैं अलीशा और ज़ैन, जो अपने पिछले रिश्तों में असंतुष्ट हैं, या एक दूसरे से पहली मुलाक़ात में ही मोह गए ...

आनेवाला पल, गानेवाला है उर्फ़ "यूँ होता तो क्या होता?"

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सन्न सत्तर की बात है। निर्माता ऋषिकेश मुखर्जी को एक और रोचक चलचित्र सूझा। कहानी का मुख्य पात्र था एक कर्क-रोगी, जो बस कुछ और महीनों का ही मेहमान था। कहानी तैय्यार थी, गुलज़ार की थी, ज़रूरत थी तो बस एक जीते-जागते आनंद  की। सलाह-मशवरा हुआ, और हरफ़नमौला किशोर को आनंद के किरदार के लिए चुना गया। साथ ही महमूद को चिकित्सक भास्कर के रूप में बिठाया गया। ऋषि-दा को पड़ोसन की यादगार जोड़ी से बहुत उम्मीदें थी।  वे चलचित्र का प्रस्ताव लेकर ख़ुद किशोर-दा के घर भी पहुँचे। मगर किसी ग़लत-फ़हमी की वजह से किशोर-दा के सुरक्षा-कर्मी ने ऋषि-दा को अंदर जाने से रोक दिया। उनको सख़्त आदेश मिला था—"उस बंगाली को अंदर मत आने देना!” बहरहाल, यह वो बंगाली तो नहीं थे। ऋषि-दा सकपका गए, और पल-दो-पल में वापस घर को रवाना हो गए। उमीदें, आशाएँ और अरमान, रहे तो बस तसव्वुर में। ना तो किशोर आए, ना उनके साथ महमूद। पर चलचित्र सन्न इकहत्तर में बना, और क्या ख़ूब बना। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जोड़ी लोकप्रिय रही। जोड़ी की विडम्बना देखिए, एक सितारा साँतवे आसमान पर था, तो दूसरा-सातवाँ हिंदुस्तानी-अमावस के कोहरे को ट...

मध्यकालीन अंग्रेज़ी साहित्य और बॉलीवुड: एक ही 'ले' के दो दिलचस्प फ़िल्मी गीत

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मध्यकालीन अंग्रेज़ी साहित्य की एक बेहद मशहूर मिसाल है 'ले'। इसे आप 'लय' की तरह भी पढ़ सकते हैं। आठ-भागों में विभाजित, 'ले', (या इंगलिस्तान की दृष्टि से देखा जाए तो "ब्रेटन ले") अपनी लय से एक टाँगे-वाले की याद दिलाती है, मानो जैसे कोई ओ पी नय्यर का गीत एक पुराने बाजे पर बज रहा हो।  टिकबक-टकबक रफ़्तार वाली ये लंबी कविताएँ, अक़्सर प्रेम-कहानियों पर आधारित होती थीं/होती हैं। इस सत्र में मैंने अपने विश्वविद्यालय में एक सुप्रसिद्ध कविता "सर औऱफीओ" पढ़ी थी। इसका लेखक मैं नहीं पहचानता। बस इतना जानता हूँ, कि इसकी पहली कुछ पंक्तियों को पढ़कर मेरे मन में हमेशा की तरह फ़िल्मी गीत बजने लगे। और गीत भी कौनसा?  "एक था गुल और एक थी बुलबुल,  दोनों चमन में रहते थे, है ये कहानी बिल्कुल सच्ची, मेरे नाना कहते थे" 'सर औऱफीओ' की शुरआत भी कुछ ऐसे हुई। पहली कुछ पंक्तियों का, बस पहली ही कुछ पंक्तियों का अनुवाद मैंने कुछ ऐसे किया था: (पूरी कविता बहुत लंबी है, ज़रा वक्त लगेगा उसके अनुवाद में)। इस कविता को आप अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं। "किससे किससे, ...

इस की क्या ज़रूरत थी?

बड़े ताज्जुब की बात है कि हिंदी चलचित्र जगत (चलिए, सिनेमा या बॉलीवुड ही कह लीजिए) की समीक्षा, सराहना, और आलोचना के लिए आम आदमी अक़्सर अंग्रेज़ी सम्पादिकय विश्लेषणों की ओर ज़्यादा आकर्षित होता है। यह आकर्षण स्वाभाविक है; अंग्रेज़ी अब एक वैश्विक भाषा बन चुकी है और बॉलीवुड से जुड़ा कोई भी विश्लेषण―गर अंग्रेज़ी में छपा हो―सार्वजनिक-सा बन जाता है। और जब विश्लेषण सार्वजनिक बन जाएँ, तो यूँ समझ लीजिए, हिंदी फ़िल्म जगत की तरक्की दुगनी हो गई है। ऐसा भी नहीं कि बॉलीवुड चलचित्रों के विश्लेषण हिंदी में नही छपते होंगे। मलाल तो इस बात का होता है कि आजकल हिंदी अखबारों में हिंदी से ज़्यादा अंग्रेज़ी नज़र आती है। देवनागरी में टीकाकरण की जगह वैक्सीन पढ़ कर आँखें चौंधिया जाती हैं, यूँ लगता है जैसे ताज महल की तामीर लकड़ी से कर दी गई हो। मगर ताज तो ताज है, संग-ए-मर्मर में ही जचता है।  ठीक इसी तरह, मैं अपने "ब्लॉग" के ज़रिए हिंदी सिनेमा पर अपनी विशेष टिप्पणियाँ पेश करना चाहूँगा―क्लिष्ट से क्लिष्ट―मेरा मतलब शुद्ध हिंदी/हिंदुस्तानी में। काम ज़रा पेचीदा है, देखते हैं कितना क़ामयाब रहता है हमारा-आपका फ़िल्मीबॉय!